Wednesday, 20 November 2013

भारत देश का प्राचीन नाम आर्यावर्त है। आर्यावर्त के पूर्व इसका कोई नाम नहीं था। कहीं-कहीं जम्बूद्वीप का उल्लेख मिलता है। कुछ लोगों का मानना है कि इसे पहले 'अजनाभ खंड' कहा जाता था। अजनाभ खंड का अर्थ ब्रह्मा की नाभि या नाभि से उत्पन्न।

       

लेकिन वेद-पुराण और अन्य धर्मग्रंथों के साथ वैज्ञानिक शोधों का अध्ययन करें तो पता चलता है कि मनुष्य व अन्य जीव-जंतुओं की वर्तमान आदि सृष्टि (उत्पत्ति) हिमालय के आसपास की भूमि पर हुई थी जिसमें तिब्बत को इसलिए महत्व दिया गया क्योंकि यह दुनिया का सर्वाधिक ऊँचा पठार है। हिमालय के पास होने के कारण पूर्व में भारत वर्ष को हिमवर्ष भी कहा जाता था।

वेद-पुराणों में तिब्बत को त्रिविष्टप कहा गया है। महाभारत के महाप्रस्थानिक पर्व में स्वर्गारोहण में स्पष्ट किया गया है कि तिब्बत हिमालय के उस राज्य को पुकारा जाता था जिसमें नंदनकानन नामक देवराज इंद्र का देश था। इससे सिद्ध होता है कि इंद्र स्वर्ग में नहीं धरती पर ही हिमालय के इलाके में रहते थे। वहीं शिव और अन्य देवता भी रहते थे।

पूर्व में यह धरती जल प्रलय के कारण जल से ढँक गई थी। कैलाश, गोरी-शंकर की चोटी तक पानी चढ़ गया था। इससे यह सिद्ध होता है कि संपूर्ण धरती ही जलमग्न हो गई थी, लेकिन विद्वानों में इस विषय को लेकर मतभेद हैं। कुछ का मानना है कि कहीं-कहीं धरती जलमग्न नहीं हुई थी। पुराणों में उल्लेख भी है कि जलप्रलय के समय ओंकारेश्वर स्थित मार्कंडेय ऋषि का आश्रम जल से अछूता रहा। 

कई माह तक वैवस्वत मनु (इन्हें श्रद्धादेव भी कहा जाता है) द्वारा नाव में ही गुजारने के बाद उनकी नाव गोरी-शंकर के शिखर से होते हुए नीचे उतरी। गोरी-शंकर जिसे एवरेस्ट की चोटी कहा जाता है। दुनिया में इससे ऊँचा, बर्फ से ढँका हुआ और ठोस पहाड़ दूसरा नहीं है।

तिब्बत में धीरे-धीरे जनसंख्या वृद्धि और वातावरण में तेजी से होते परिवर्तन के कारण वैवस्वत मनु की संतानों ने अलग-अलग भूमि की ओर रुख करना शुरू किया। विज्ञान मानता है कि पहले सभी द्वीप इकट्ठे थे। अर्थात अमेरिका द्वीप इधर अफ्रीका और उधर चीन तथा रूस से जुड़ा हुआ था। अफ्रीका भारत से जुड़ा हुआ था। धरती की घूर्णन गति और भू-गर्भीय परिवर्तन के कारण धरती द्वीपों में बँट गई।

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इस जुड़ी हुई धरती पर ही हिमालय की निम्न श्रेणियों को पार कर मनु की संतानें कम ऊँचाई वाले पहाड़ी विस्तारों में बसती गईं। फिर जैसे-जैसे समुद्र का जल स्तर घटता गया वे और भी मध्य भाग में आते गए। राजस्थान की रेगिस्तान इस बाद का सबूत है कि वहाँ पहले कभी समुद्र हुआ करता था। दक्षिण के इलाके तो जलप्रलय से जलमग्न ही थे। लेकिन बहुत काल के बाद धीरे-धीरे जैसे-जैसे समुद्र का जलस्तर घटा मनु का कुल पश्चिमी, पूर्वी और दक्षिणी मैदान और पहाड़ी प्रदेशों में फैल गए।

जो हिमालय के इधर फैलते गए उन्होंने ही अखंड भारत की सम्पूर्ण भूमि को ब्रह्मावर्त, ब्रह्मार्षिदेश, मध्यदेश, आर्यावर्त एवं भारतवर्ष आदि नाम दिए। जो इधर आए वे सभी मनुष्य आर्य कहलाने लगे। आर्य एक गुणवाचक शब्द है जिसका सीधा-सा अर्थ है श्रेष्ठ। यही लोग साथ में वेद लेकर आए थे। इसी से यह धारणा प्रचलित हुई कि देवभूमि से वेद धरती पर उतरे। स्वर्ग से गंगा को उतारा गया आदि अनेक धारणाएँ।

इन आर्यों के ही कई गुट अलग-अलग झुंडों में पूरी धरती पर फैल गए और वहाँ बस कर भाँति-भाँति के धर्म और संस्कृति आदि को जन्म दिया। मनु की संतानें ही आर्य-अनार्य में बँटकर धरती पर फैल गईं। पूर्व में यह सभी देव-दानव कहलाती थीं। इस धरती पर आज जो भी मनुष्य हैं वे सभी वैवस्वत मनु की ही संतानें हैं इस विषय में विद्वानों में मतभेद हैं। यह अभी शोध का विषय है।

भारतीय पुराणकार सृष्टि का इतिहास कल्प में और सृष्टि में मानव उत्पत्ति व उत्थान का इतिहास मवन्तरों में वर्णित करते हैं। और उसके पश्चात् मन्वन्तरों का इतिहास युग-युगान्तरों में बताते हैं।

'प्राचीन ग्रन्थों में मानव इतिहास को पाँच कल्पों में बाँटा गया है। (1). हमत् कल्प 1 लाख 9 हजार 8 सौ वर्ष विक्रमीय पूर्व से आरम्भ होकर 85800 वर्ष पूर्व तक, (2). हिरण्य गर्भ कल्प 85800 विक्रमीय पूर्व से 61800 वर्ष पूर्व तक, ब्राह्म कल्प 60800 विक्रमीय पूर्व से 37800 वर्ष पूर्व तक, (3). ब्राह्म कल्प 60800 विक्रमीय पूर्व से 37800 वर्ष पूर्व तक, (4). पाद्म कल्प 37800 विक्रम पूर्व से 13800 वर्ष पूर्व तक और (5). वराह कल्प 13800 विक्रम पूर्व से आरम्भ होकर इस समय तक चल रहा है।

अब तक वराह कल्प के स्वायम्भु मनु, स्वरोचिष मनु, उत्तम मनु, तमास मनु, रेवत-मनु चाक्षुष मनु तथा वैवस्वत मनु के मन्वन्तर बीत चुके हैं और अब वैवस्वत तथा सावर्णि मनु की अन्तर्दशा चल रही है। सावर्णि मनु का आविर्भाव विक्रमी सम्वत प्रारम्भ होने से 5630 वर्ष पूर्व हुआ था।'--श्रीराम शर्मा आचार्य (गायत्री शक्ति पीठ)

गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स ने कल्प को समय का सर्वाधिक लम्बा मापन घोषित किया है।

त्रिविष्टप अर्थात तिब्बत या देवलोक से वैवस्वत मनु के नेतृत्व में प्रथम पीढ़ी के मानवों (देवों) का मेरु प्रदेश में अवतरण हुआ। वे देव स्वर्ग से अथवा अम्बर (आकाश) से पवित्र वेद पुस्तक भी साथ लाए थे। इसी से श्रुति और स्मृति की परम्परा चलती रही। वैवस्वत मनु के समय ही भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार हुआ।

वैवस्वत मनु की शासन व्यवस्था में देवों में पाँच तरह के विभाजन थे: देव, दानव, यक्ष, किन्नर और गंधर्व। वैवस्वत मनु के दस पुत्र थे। इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध पुत्र थे। इसमें इक्ष्वाकु कुल का ही ज्यादा विस्तार हुआ। इक्ष्वाकु कुल में कई महान प्रतापी राजा, ऋषि, अरिहंत और भगवान हुए हैं। इति।

राजा मनु और नूह...
PICS: आज भी यहां की मिट्टी में दबी हैं रूहानी ताकतेंउदयपुर.  ये है जैसलमेर का कुलधरा गांव। इस गांव में 170 साल पहले कुछ ऐसा हुआ था कि एक ही रात में यहां के 84 गांवों के लोग गायब हो गए। आज भी रहस्य है कि ऐसा क्या हुआ कि यहां के लोग कहां चले गए।
कहते हैं कि इस गांव को एक ऐसा श्राप दिया गया कि ये गांव रातोंरात उजड़ गया और आज भी यहां कोई नहीं रहता। जिस रात गांव के लोग यहां से गायब हुए, आज भी सब वैसा का वैसा है। घरों की दीवारें, किवाड़। ये गांव खंडहर में जरूर तब्दील हो गए हैं लेकिन इनका अस्तित्व आज भी बना हुआ है।

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  एक कब्रिस्‍तान जहां आज भी घूमते हैं पिशाच                           

भूत, रूह या आत्‍मा का कोई एक ठिकाना निश्‍चीत नहीं किया जा सकता है। लेकिन दुनिया भर में कुछ ऐसी जगहें होती है, जिसे ये रूहें और आत्‍मा अपना ठिकाना बना लेती है। अभी तक आपने पुरानी इमारतों, और जहाजों पर रूहों के कब्‍जे के बारें में पढ़ा आज हम आपकों एक ऐसी कब्रिस्‍तान के बारें में बताऐंगे जहां पर वैम्‍पायरों का राज है। एक ऐसा कब्रिस्‍तान जिसे मौत के बाद मूर्दो को गहरी नींद में सोने के लिए बनाया गया लेकिन जो बन गया है वैम्‍पायर्स यानी पिशाच का अड्डा। हम बात कर रहे है। लंदन के हाईगेट कब्रिस्‍तान की। इस कब्रिस्‍तान में बहुत से लोगों ने वैम्‍पायर्स को देखा है जो कि आये दिन इस कब्रिस्‍तान में घुमते रहते है। अभी तक वैम्‍पायर्स के बारें में दुनिया भर में केवल अटकलें ही लगायी जाती है। लेकिन इस कब्रिस्‍तान में कई बार लोगों ने मौत के इन राक्षसों को महसूस किया है। आप खुद ही महसूस कर सकते है कि कोई भी ऐसी जगह जहां आप अकेले हो और कोई ऐसा साया जो आपके आस पास ही किसी मूर्दे के शरीर से खून पी रहा हो तो कैसा महसूस होगा। वैसे भी दुनिया भर में कब्रिस्‍तान का नाम सुनकर लोगों को भूत, प्रेत, और आत्‍माओं का ख्‍याल आ जाता है। कब्रिस्‍तान के बारें में बहुत से लोग यही मानते है कि वहां पर रूहो का होना लाजमी है। ये सच है क्‍योंकि रूहों का वास वहीं सबसे ज्‍यादा होता है जहां उसके साथ कोई हादसा हुआ हो या जहां उसका शरीर हो। लेकिन ये रूहे भी कभी किसी को परेशान नहीं करना चाहती है। ये भी अपनी दुनिया में अलग तरह से विचरण करती रहती है। आईऐ आज लंदन के उस कब्रिस्‍तान की सैर करें। हाईगेट कब्रिस्‍तान का इतिहास हाईगेट कब्रिस्‍तान उत्‍तरी लंदन में बनाया गया एक कब्रिस्‍तान है। यह काफी बड़ा और विशाल है। इस कब्रिस्‍तान में कई गेट है। दुनिया भर में सबसे बडे कब्रिस्‍तान के अलांवा यह कार्ल मार्क्‍स की कब्र के लिए भी दुनिया भर में विख्‍यात है। इस कब्रिस्‍तान को सन 1839 में शुरू किया गया था। उस समय लंदन एक विचित्र संकट से जुझ रहा था। लंदन में उस समय मृत्‍यु दर ज्‍यादा दी और आये दिनों लोगों की भारी संख्‍या में मौत हो रह‍ी थी। लोगों की हो रही लगातार मौतों के बावजूद भी लंदन में उन्‍हे दफनाने के लिए कोई जगह नहीं बची थी। इसी समस्‍या से उबरने के लिए लंदन के उत्‍तरी छोर में इस हाईगेट कब्रिस्‍तान का निर्माण किया गया। इस कब्रिस्‍तान के निर्माण के पहले जगह की किल्‍लत के चलते लोग मूर्दो को अपने घर के आस पास ही गलियसारों में दफन कर दे रहे थे जो कि बहुत ही भयावह स्‍ि‍थती थी। रास्‍तों में दफन मूर्दो से भयानक बदबू आती थी। इस समस्‍या से उबरने के लिए अधिकारियों ने इस कब्रिस्‍तान का निर्माण कराया था। हाईगेट की संरचना और आकार हाईगेट उस समय दुनिया का सबसे बड़ा मानव निर्मित कब्रगाह था। यह कब्रिस्‍तान 37 एकड़ जमीन में फैला हुआ है और उत्‍तरी लंदन के बीचों बीच बनाया गया है। इस कब्रिस्‍तान में एक घंटा घर और ट्यूडर शैली का प्रयोग किया गया है। इसकी इमारतों में शानदार लकडियों का इस्‍तेमाल किया गया है। इस कब्रिस्‍तान मे मिश्र की शैली का भी पुरा प्रयोग किया गया है। इस कब्रगाह के लिए भी आया जिसके लिए इसका निर्माण किया गया था, पहली बार इस कब्रिस्‍तान में 26 मई 1839 को लिटील विंडमिल स्ट्रिट की एलिजाबेथ जैक्‍सन को दफनाया गया, और इसी के साथ सिलसिला शुरू हुआ जो आज तक जारी है। कब्रिस्‍तान में वैम्‍पायर्स यह कब्रिस्‍तान बहुत ही बड़ा है और इसमें न जाने कितने लोग दफन है। जहां पर एक साथ जमीन में इतने लोग दफन होंगे वहां रूहों और आत्‍माओं का दिखना तो लाजमी ही होगा। इस कब्रिस्‍तान में भी बहुत सी ऐसी रूहे है जो गाहें बगाहें लोगों को दिख जाती है। कई बार लोगों को इसका आभास होता है और उनके साथ कोई हादसा हो जाता है। इस कब्रिस्‍तान में कई बार वैमपायर्स को देखा गया है और उन्‍हे महसूस किया गया है। सबसे पहला मामला जो प्रकाश में आया था वो था सन 1970 में जब स्‍कूल की दो छात्राओं ने कब्रिस्‍तान के ए‍क किनारें एक वैम्‍पायर कों बैठा देखने का दावा किया था। उन दोनों छात्राओं का कहना था कि जब वो स्‍कूल से लौट रही थी और जब वो कब्रिस्‍तान के पास पहुंची तो उस समय शाम हो गयी थी और हल्‍का हल्‍का अंधेरा शुरू हो गया था। उसी समय उन्‍हे कुछ अजीब सी आवाज सुनायी दी जो कि कब्रिस्‍तान के तरफ से आ रही थी। उस समय जब उन्‍होने कब्रिस्‍तान की तरफ देखा तो वहां एक आदमी जैसा कोई बैठा और कब्र से शव को निकाल कर उनका खुन पी रहा था। इसके अलांवा इस हादसें के एक हफ्ते बाद ही एक और मामला प्रकाश में आया जहां एक प्रेमी जोड़ ने भी एक वैम्‍पायर को देखन की बात कहीं। उनका कहना था कि वो दोनों कब्रिस्‍तान के तीसरे गेट की तरफ से रात में गुजर रहे थे उसी वक्‍त उन्‍होने एक बहुत ही बड़े आदमी को देखा जो कि सामान्‍य लंबाई से बहुत ज्‍यादा था उसका चेहरा अंधेरे के कारण देख नहीं पाया गया लेकिन उसके चेहरे का आकार और बनावट मनुष्‍यों से अलग थी। उनका कहना था कि शायद उस अजीब से साये ने उन्‍हे देख लिया था और वो उन्‍ही के तरफ धिमें धिमें बढ रहा था। इतना देख दोनों वहां से भाग गये। इस तरह की कई घटनाए है जो कि हाईगेट कब्रिस्‍तान में देखने को मिली है। कई बार लोगों ने इस महसूस किया है। इस कब्रिस्‍तान से होकर जाने वाले सड़क पर कई बार लोगों की दुर्घटनाए भी हुयी है। इस कब्रिस्‍तान में कई बार कब्रों से लाशों के गायब होने का भी मामला सामने आ चुका है। आज भी इस कब्रिस्‍तान में आसानी से रूहों और आत्‍माओं को महसूस किया जा सकता है। ;





एक कब्रिस्‍तान जहां आज भी घूमते हैं पिशाच

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           मौत, फांसी, और कत्‍लों का गवाह एक घर, जहां रूहें करती है बसेरा




मौत, फांसी, कत्‍ल, हादसे किसी भी शानदार से शानदार जगह को विरान बना देते हैं। जैसा कि आपको पूर्व के लेख में बता दिया गया था, कि हम रूहों और आत्‍माओं के लिए कोई एक जगह निश्‍चीत नहीं कर सकते। लेकिन वो अदृश्‍य और स्‍वतंत्र हैं वो चाहे जहां भी अपना बसेरा कर सकती हैं। लेकिन ज्‍यादातर मामलों में रूहें और आत्‍माएं हादसों की जगहों या अपनी मौत के कारणों के स्‍थान पर ही भटकती रहती हैं। क्‍या होती हैं रूहें और उनकी प्रवृति ऐसी जगहों पर इन्‍हे महसूस किया जा सकता है। यह रूहें हमेशा अपने आप को आम दुनिया से अलग रखना चाहती है। जब हम कभी किसी ऐसी जगह पर एकांत में होते हैं तो इन रूहों का आभास हमें होता है। इनकी भी प्रकृति बिलकुल सांपों से मिलती जुलती है, जब इंसान के सामने कोई सांप अचानक आ जाता है तो वो इंसानों के पैरों के कदमों के आहट के अनुसार चल कर उस जगह से भागना चाहता है, लेकिन एक शब्‍द जिसे डर कहते हैं उसे इंसानी स्‍वाभाव नहीं छोड़ पाता है और उसके फलस्‍वरूप वो सांप को दुश्‍मन मान कर उन्‍हे छेड़ता है या मार देता है। यही वो समय होता है जब सांप भी "डर" के वशीभूत इंसान पर हमला करता है फुफकारता और इंसान को दूर करने का प्रयास करता है। ठिक वैसे ही रूहें भी एकेले इंसान या शांत जगहों पर जहां उनका बसेरा होता है वहां से इंसान को हटाने के लिए अपने होने का आभास कराती हैं। ये रूहें शरीर विहीन होती हैं इसलिए प्रत्‍यक्ष रूप से आपके समाने नहीं आ सकती, लेकिन आस पास के वातावरण में बदलाव करके, अजीब सी खुश्‍बु पैदा कर, हवा का सहारा लेकर वो इंसानों को डराने का प्रयास करती हैं। आज हम आपको अपने इस सीरीज के पांचवें लेख में अमेरिका के ऐसे घर के बारे में बताएंगे जो अपने ही लोगों की मौत, हत्‍या और उनकी आत्‍महत्‍याओं की कहानी बयां करती है। इस घर के लोग तो आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी रूहें आज भी इन घरों में मौजूद हैं। अमेरिका के लुसियाना प्रांत के सेंट फ्रेसिसविले में मौजूद इस घर को आज मिर्लेस प्‍लांटेशन के नाम से जाना जाता है। तो आइऐ चलते हैं एक खौफनाक और रोमांचकारी सफर पर। मिर्लेस प्‍लांटेशन का इतिहास मिर्लेस प्‍लांटेशन का निर्माण सन 1794 में ब नाम के एक अमेरिकी नागरिक डेविड ब्रैडफोर्ड ने कराया था। डेविड ब्रैडफोर्ड का जन्‍म अमेरिका में ही हुआ था और वो वहीं पर रहकर व्‍यापार करते थे। उस समय उन्‍होंने एलिजाबेथ नामक महिला से विवाह किया और कुछ समय बाद उनके पांच बच्‍चे भी हुए। पांच बच्‍चों के बाद डेविड को एक बड़े मकान की जरूरत पड़ी और उन्‍होंने इस मकान का निर्माण कराया। मिर्लेस प्‍लांटेशन में रहने वाले लोगों की एक के बाद एक करके दस लोगों की मौत हुई। इस मकान को बनवाकर डेविड भी इस मकान में ज्‍यादा दिन नहीं रह पाये। कुछ सालों बाद ही उनकी भी मौत हो गयी थी। डेविड अपने इस मकान का पूरा आनंद नहीं उठा पाये थे, क्‍योकि मौत से पहले उन्‍होंने आर्थिक तंगी के चलते अपना यह मकान एक शिक्षक बायु सारा को बेच दिया था। सारा डेविड के एक बच्‍चे क्‍लार्क वुडरूफ को अपने साथ रखकर कानून की पढ़ाई करती थी, जिसने कुछ दिनों बाद अपने शिक्षक की ही बेटी सारा मथिल्‍डा से शादी कर ली। डेविड ब्रैडफोर्ड की मौत के बाद उनकी पत्‍नी अकेले थी, तो उन्‍होंने घर में ही बागवानी शुरू कर दी और पौधारोपड़ का काम करने लगी। मिर्लेस प्‍लांटेशन में मौतों का सिलसिला मिर्लेस प्‍लांटेशन में मौतों का सिलसिला सारा मथिल्‍डा के मौत से शुरू हुआ। सारा की मौत 21 जुलाई 1823 में पिलीया बिमारी से हुयी, उस समय लुसियाना में यह बिमारी अपने चरम पर थी। अभी मिर्लेस प्‍लांटेशन में एक मौत हुयी ही थी कि तभी 1824 में सितम्‍बर माह में सारा के तीन माह के बेटे जेम्‍स की मौत भी पिलीया से हो गयी। उसके बाद वुडरूफ उस घर में और नही रहना चाहता था और वो अपनी मां के साथ कहीं चला गया जहां उसकी मां की भी कुछ दिनों के बाद मौत हो गयी। उसके बाद वुडरूफ ने इस मकान को स्टर्लिंग नामक परिवार के हाथों बेच दिया। स्टर्लिंग बहुत अच्‍छा परिवार था, स्टर्लिंग अपने परिवार के साथ इस मकान में आयें और इस मकान में उन्‍होने कई फेरबदल किया। स्टर्लिंग ने डेविड के इस मकान को और बड़ा और दुगाना कर दिया। अपने शौक को पुरा करते करते 17 जुलाई 1854 को स्टर्लिंग की भी मौत हो गयी। स्टर्लिंग की पत्‍नी मरियम इस मकान में रहने लगी थी। इसके अलांवा मिर्लेस प्‍लांटेशन में और भी ऐसी मौतें हयी जिसे जानकर आपकी रूह तक कांप उठेगी। मिर्लेस प्‍लांटेशन में हत्‍या और आत्‍महत्‍या मिर्लेस प्‍लांटेशन में जब वुडरूफ अपने पत्‍नी के साथ तो उसी पत्‍नी ने दो बेटियों को जन्‍म दिया था और वो गर्भवती थी, इसी दौरान वुडरूफ का संबंध अपने एक दासी चेलोय से हो गया था। चेलोय को जबरदस्‍ती वुडरूफ की मांगों को पुरा करना पड़ता था। एक दिन चेलोय ने इसका विरोध किया तो उसका कान काट दिया गया। अपने इसी अपमान के बदला लेने के लिए चेलोय ने एक दिन वुडरूफ के बड़ी बेटी के जन्‍मदिन के केक में जहर मिला दिया। लेकिन इस केक को वुडरूफ के अलावा उसकी पत्‍नी व दोनों बेटियों ने ही खाया था, जिससे उनकी तो मौत हो गयी लेकिन, वुडरूफ बच गया। अपने इस कृत्‍य पर चेलोय को बहुत शर्मिदगी महसूस हुयी और उसने सजा पाने के डर से खुद को अपने कमरे में फांसी से लटका दिया। उसके बाद वुडरूफ ने उसके शव को काट कर नीचे उतार और उसे पानी में पत्‍थरों के सहारे बांधकर फेंक दिया। उसके बाद वो पार्टी वाले कमरे में गया और उसे हमेशा के लिए बंद कर दिया। कुछ दिनो बाद वुडरूफ अपने घर के पोर्च पर खडा था उसी समय किसी ने उसे गोली मार दी और मौके पर ही उसकी भी मौत हो गयी। मिर्लेस प्‍लांटेशन में रूहों का कब्‍जा आज भी मिर्लेस प्‍लांटेशन में रूहों का पुरी तरह से कब्‍जा है। यह मकान कई हत्‍याओं और आत्‍महत्‍याओं का गवाह है। मकान के सिड़ीयों के पास जाते समय जब आप अकेले जाएंगे तो ऐसा महसूस होगा कि सारा सीढि़यों से उतर रही है। कई लोगों ने सारा को और उसके बच्‍चों को कमरों में दौड़ते हुए देखने का दावा किया है। वही मिर्लेस प्‍लांटेशन के बाहर चेलोय के कमरे में आज भी किसी लड़की के सीसकने की आवाजें साफ सुनई देती हैं। मकान के पिछे वाले हिस्‍से में एक पुराना पेड़ है, जहां एक महिला का शव पेड़ से लटका हुआ दिखायी देता है। इसके अलांवा मिर्लेस प्‍लांटेशन का वो कमरा जहां आखिरी बार पार्टी की गयी थी उस कमरे में आज भी उस केक की महक को महसुस किया जाता है, साथ ही साथ बच्‍चों की रोने की आवाजें भी कई लोगों को डरा चुकी है। आज भी इस मकान की विरानी में लोग रूहों के इधर उधर दौड़ने और पेड़ों पर हवा के साथ झुलने को महसूस करते है। मिर्लेस प्‍लांटेशन के अन्‍दर सारा के कमरे के ठिक बगल में एक हाल है जहां एक पुराना सीसा लगा हुआ, कइ लोगों ने इस बात का दावा किया है कि इस सीसे में कभी कभी एक महिला जो कि सफेद लिवास में है और गर्दन झुकी हुयी, आंखों पर काले घेरे और उसका एक हाथ आपकी तरफ इशारा करता है। जैसे कि वो आपकों बुला रही है, इस रूप में देखा गया है। वहीं सारा के कमरे में एक पुराना प्‍यानों रखा हुआ है जो कि दिन भर में कई बार अपने आप बज उठता है।

मौत, फांसी, और कत्‍लों का गवाह एक घर, जहां रूहें करती है बसेरा

haunted real story किला जहां सूरज ढलते ही जाग जाती हैं आत्‍माएं created by om vikash tripathi


किला जहां सूरज ढलते ही जाग जाती हैं आत्‍माएं


पुराने किले, मौत, हादसों, अतीत और रूहों का अपना एक अलग ही सबंध और संयोग होता है। ऐसी कोई जगह जहां मौत का साया बनकर रूहें घुमती हो उन जगहों पर इंसान अपने डर पर काबू नहीं कर पाता है और एक अजीब दुनिया के सामने जिसके बारें में उसे कोई अंदाजा नहीं होता है, अपने घुटने टेक देता है। दुनिया भर में कई ऐसे पुराने किले है जिनका अपना एक अलग ही काला अतीत है और वहां आज भी रूहों का वास है। दुनिया में ऐसी जगहों के बारें में लोग जानते है, लेकिन बहुत कम ही लोग होते हैं, जो इनसे रूबरू होने की हिम्‍मत रखतें है। जैसे हम दुनिया में अपने होने या ना होने की बात पर विश्‍वास करतें हैं वैसे ही हमारे दिमाग के एक कोने में इन रूहों की दुनिया के होने का भी आभास होता है। ये दीगर बात है कि कई लोग दुनिया के सामने इस मानने से इनकार करते हों, लेकिन अपने तर्कों से आप सिर्फ अपने दिल को तसल्‍ली दे सकते हैं, दुनिया की हकीकत को नहीं बदल सकते है। कुछ ऐसा ही एक किलें के बारे में आपको बताउंगा जो क‍ि अपने सीने में एक शानदार बनावट के साथ-साथ एक बेहतरीन अतीत भी छुपाए हुए है। अभी तक आपने इस सीरीज के लेखों में केवल विदेश के भयानक और डरावनी जगहों के बारें में पढ़ा है, लेकिन आज आपको अपने ही देश यानी की भारत के एक ऐसे डरावने किले के बारे में बताया जायेगा, जहां सूरज डूबते ही रूहों का कब्‍जा हो जाता है और शुरू हो जाता है मौत का तांडव। राजस्‍थान के दिल जयपुर में स्थित इस किले को भानगड़ के किले के नाम से जाना जाता है। तो आइये इस लेख के माध्‍यम से भानगड़ किले की रोमांचकारी सैर पर निकलते हैं। भानगड़ किला एक शानदार अतीत के आगोश में भानगड़ किला सत्रहवीं शताब्‍दी में बनवाया गया था। इस किले का निर्माण मान सिंह के छोटे भाई राजा माधो सिंह ने करावाया था। राजा माधो सिंह उस समय अकबर के सेना में जनरल के पद पर तैनात थे। उस समय भानगड़ की जनसंख्‍या तकरीबन 10,000 थी। भानगढ़ अल्‍वार जिले में स्थित एक शानदार किला है जो कि बहुत ही विशाल आकार में तैयार किया गया है। चारो तरफ से पहाड़ों से घिरे इस किले में बेहतरीन शिल्‍पकलाओ का प्रयोग किया गया है। इसके अलावा इस किले में भगवान शिव, हनुमान आदी के बेहतरीन और अति प्राचिन मंदिर विध्‍यमान है। इस किले में कुल पांच द्वार हैं और साथ साथ एक मुख्‍य दीवार है। इस किले में दृण और मजबूत पत्‍थरों का प्रयोग किया गया है जो अति प्राचिन काल से अपने यथा स्थिती में पड़े हुये है। भानगड किले पर कालें जादूगर सिंघिया का शाप भानगड़ किला जो देखने में जितना शानदार है उसका अतीत उतना ही भयानक है। आपको बता दें कि भानगड़ किले के बारें में प्रसिद्व एक कहानी के अनुसार भागगड़ की राजकुमारी रत्‍नावती जो कि नाम के ही अनुरूप बेहद खुबसुरत थी। उस समय उनके रूप की चर्चा पूरे राज्‍य में थी और साथ देश कोने कोने के राजकुमार उनसे विवाह करने के इच्‍छुक थे। उस समय उनकी उम्र महज 18 वर्ष ही थी और उनका यौवन उनके रूप में और निखार ला चुका था। उस समय कई राज्‍यो से उनके लिए विवाह के प्रस्‍ताव आ रहे थे। उसी दौरान वो एक बार किले से अपनी सखियों के साथ बाजार में निकती थीं। राजकुमारी रत्‍नावती एक इत्र की दुकान पर पहुंची और वो इत्रों को हाथों में लेकर उसकी खुशबू ले रही थी। उसी समय उस दुकान से कुछ ही दूरी एक सिंघीया नाम व्‍यक्ति खड़ा होकर उन्‍हे बहुत ही गौर से देख रहा था। सिंघीया उसी राज्‍य में रहता था और वो काले जादू का महारथी था। ऐसा बताया जाता है कि वो राजकुमारी के रूप का दिवाना था और उनसे प्रगाण प्रेम करता था। वो किसी भी तरह राजकुमारी को हासिल करना चाहता था। इसलिए उसने उस दुकान के पास आकर एक इत्र के बोतल जिसे रानी पसंद कर रही थी उसने उस बोतल पर काला जादू कर दिया जो राजकुमारी के वशीकरण के लिए किया था।
राजकुमारी रत्‍नावती ने उस इत्र के बोतल को उठाया, लेकिन उसे वही पास के एक पत्‍थर पर पटक दिया। पत्‍थर पर पटकते ही वो बोतल टूट गया और सारा इत्र उस पत्‍थर पर बिखर गया। इसके बाद से ही वो पत्‍थर फिसलते हुए उस तांत्रिक सिंघीया के पीछे चल पड़ा और तांत्रिक को कुलद दिया, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गयी। मरने से पहले तांत्रिक ने शाप दिया कि इस किले में रहने वालें सभी लोग जल्‍द ही मर जायेंगे और वो दोबारा जन्‍म नहीं ले सकेंगे और ताउम्र उनकी आत्‍माएं इस किले में भटकती रहेंगी। उस तांत्रिक के मौत के कुछ दिनों के बाद ही भानगडं और अजबगढ़ के बीच युद्व हुआ जिसमें किले में रहने वाले सारे लोग मारे गये। यहां तक की राजकुमारी रत्‍नावती भी उस शाप से नहीं बच सकी और उनकी भी मौत हो गयी। एक ही किले में एक साथ इतने बड़े कत्‍लेआम के बाद वहां मौत की चींखें गूंज गयी और आज भी उस किले में उनकी रू‍हें घुमती हैं। किलें में सूर्यास्‍त के बाद प्रवेश निषेध फिलहाल इस किले की देख रेख भारत सरकार द्वारा की जाती है। किले के चारों तरफ आर्कियोंलाजिकल सर्वे आफ इंडिया (एएसआई) की टीम मौजूद रहती हैं। एएसआई ने सख्‍त हिदायत दे रखा है कि सूर्यास्‍त के बाद इस इलाके किसी भी व्‍यक्ति के रूकने के लिए मनाही है। इस किले में जो भी सूर्यास्‍त के बाद गया वो कभी भी वापस नहीं आया है। कई बार लोगों को रूहों ने परेशान किया है और कुछ लोगों को अपने जान से हाथ धोना पड़ा है। इस ऐतिहासिक किले की यात्रा करने के लिए आप नीचे दिये गये लिंक पर‍ क्लिक करें और जानें कि आप कैसे इस जगह जा सकतें हैं।  कैसे करें भानगढ़ की यात्रा? किलें में रूहों का कब्‍जा इस किले में कत्‍लेआम किये गये लोगों की रूहें आज भी भटकती हैं। कई बार इस समस्‍या से रूबरू हुआ गया है। एक बार भारतीय सरकार ने अर्धसैनिक बलों की एक टुकड़ी यहां लगायी थी ताकि इस बात की सच्‍चाई को जाना जा सकें, लेकिन वो भी असफल रही कई सैनिकों ने रूहों के इस इलाके में होने की पुष्ठि की थी। इस किले में आज भी जब आप अकेलें होंगे तो तलवारों की टनकार और लोगों की चींख को महसूस कर सकतें है। इसके अलांवा इस किले भीतर कमरों में महिलाओं के रोने या फिर चुडि़यों के खनकने की भी आवाजें साफ सुनी जा सकती है। किले के पिछले हिस्‍सें में जहां एक छोटा सा दरवाजा है उस दरवाजें के पास बहुत ही अंधेरा रहता है कई बार वहां किसी के बात करने या एक विशेष प्रकार के गंध को महसूस किया गया है। वहीं किले में शाम के वक्‍त बहुत ही सन्‍नाटा रहता है और अचानक ही किसी के चिखने की भयानक आवाज इस किलें में गुंज जाती है। आपको यह आर्टिकल कैसा लगा कमेंट बॉक्‍स में अपने विचार जरूर दें।  पढ़ें दुनिया की और भी डरावनी जगहों के बारें में।  






































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खून का रंग

‘‘सुनो राजा विक्रम ! अंधक देश का राजा बड़ा ही प्रतापी और दयालु था। उसका राज्य दूर तक फैला था। राजा स्वयं अपनी प्रजा के दुख सुना करता था और यथासंभव सहायता दिया करता था। एक दिन राजा के दरबार में एक वैश्य आया। उसके साथ तीन लड़के भी थे, पर सब के सब अंधे थे वह राजा को प्रणाम कर चुपचाप खड़े हो गये थे।
‘‘राजन, मैं इस समय बहुत संकट में में हूं। आप कृपया मुझे हजार स्वर्ण मुद्राएं ऋण दें। मैं छः माह बाद वापस कर दूँगा।’’ वैश्य ने कहा।
‘‘ऐसी क्या आवश्यकता आ गयी सेठ ?’’
‘‘राजन मैं व्यापार के लिए विदेश जाऊँगा।’’
राजा चुप रह गया।

वैश्य बोला- ‘‘राजन ! स्वर्ण मुद्राओं के बदले मैं अपने तीनों बेटों को आपके पास गिरवी रखे जा रहा हूँ।’’
‘‘पर वह तो अंधे है उनका क्या उपयोग हैं ?’’

‘‘ऐसा न कहें राजन मेरे तीनों बेटें बड़े गुणी हैं। पहला लड़का घोड़े की पहचान में अद्वितीय है। दूसरा लड़का आभूषणों का अद्भुत पारखी है। तीसरा लड़का शास्त्रों का पारखी है।’’
‘‘पर अंधे होकर ....?’’ राजा को आश्चर्य हुआ।
‘‘राजा ! वे स्पर्श और गंध के आधार पर कार्य करते हैं अगर इनकी एक बात भी गलत निकले तो आप इनकी गर्दन उड़ा देना। मेरे आने पर मुझे भी दंड़ देना। आपके राजकाल में तीनों बेटे आपकी सेवा करेंगे।’’
राजा मान गया। उसने वैश्य की मांग पूरी कर दी। राजा ने तीनों लड़कों के खान-पान तथा रहने की उचित व्यवस्था की। राजा विक्रम इस प्रकार कुछ समय बीत गया, तो घोड़ों का एक व्यापारी आया।

उसने एक बड़ा सुन्दर घोड़ा दिखलाया। वह घोड़ा देखकर राजा का मन ललचा गया और उसे खरीदने को तैयार हो गया।
‘‘एकदम काबुली घोड़ा है अन्नदाता !’’ सौदागर बोला-‘‘बड़ी मेहनत से आपके पास लाया हूँ।’’
सौदागर ने बड़ा ऊंचा दाम बतलाया। पर राजा खरीदने के लिए तैयार हो गया। फिर यकायक राजा ने हुक्म दिया -‘‘वैश्य के बड़े पुत्र को बुला लाओ।’’
तुरन्त वैश्य पुत्र को पेश किया गया।
‘‘आज्ञा राजन !’’

यह घोड़ा देखकर बतलाओ—‘‘कैसा है ?’’
‘‘जो आज्ञा सरकार।’’
वह टटोलकर घोड़े के पास गया। एक अंधे को घोड़ा परखते देखकर सौदागर मुस्करा पड़ा; और लोग भी मंद-मंद मुस्करा रहे थे। भला अंधा घोड़े की क्या पहचान कर सकता है। वह लड़का घोड़े को सूंघने लगा, तो सौदागर बोला- ‘‘बस करो भाई कहीं घोड़ा भी सूंघकर परखा जाता है।’’
वैश्य का लड़का घोड़े पर हाथ फेर-फेरकर उसको जगह-जगह पर सूंघता रहा। कुछ देर बाद वह अलग हट गया।
‘‘कैसा घोड़ा है ?’’ पूछा राजा ने।
‘‘राजन ! यह घोड़ा भूलकर भी न खरीदें।’’
‘‘क्या बात है ?’’
‘‘हाथ कंगन को आरसी क्या। किसी को बैठाकर परख लें।’’
राजा ने एक सैनिक को आदेश दिया। वह घोड़े पर बैठा। कुछ दूर जाकर घोड़े ने उसे पटक दिया। फिर बुरी तरह हिनहिनाने लगा।
सौदागर आश्चर्यचकित रह गया और बोला ‘‘राजन यह घोड़ा मेरे साथ ऐसा नहीं करता।’’ तभी अंधा बोल उठा ‘‘तुम्हारे साथ क्या हर ग्वाले के साथ ऐसा नहीं करेंगा। तुम ग्वाले हो गाय-भैंस का व्यापार छोड़कर घोड़े का व्यापार कर रहे हो।’’
‘‘मैं ग्वाला हूँ तुम को कैसे पता ?’’

‘‘यह घोड़ा तुम्हारे घर ही जन्मा है। इसके माँ—बाप भी तुम्हारे पास थे तुमने इस घोड़े को भैंस का दूध पिलाया है। इसकी महक से मैं समझ गया।’’
सौदागर चकित रह गया वैश्य का लड़का एकदम सच कह रहा था
‘‘तुमने कैसे जाना।’’

‘‘सूंघकर।’’
सौदागर हाथ जोड़कर चला गया। राजा वैश्य के उस अंधे लड़के पर प्रसन्न हो गया। राजा ने आदेश दिया-‘‘इसकी खुराकी दुगुनी कर दी जाए।’’ राजा ने वैश्य की बात सच पाई।
इस प्रकार हे राजा विक्रम ! राजा के तीनों लड़के आनन्दपूर्वक रह रहे थे कि एक दिन एक जौहरी आया। उसने नाना प्रकार के हीरे-जवाहारात राजा को दिखाने शुरू कर दिए राजा ने कुछ जवाहरात पसन्द किए।
‘‘फिर हुक्म दिया-‘‘वैश्य के दूसरे लड़के को बुलाकर ला।’’

वैश्य का दूसरा अंधा लड़का आया। राजा ने उसे अपनी पसन्द के जवाहरात परखने को कहा। वह लड़का टटोलकर परखने लगा। कुछ सुन्दर जवाहरात उसने अलग कर दिए। फिर वह बोला, ‘‘इनको आप न ले।’’
‘‘क्या बात है ?’’

‘‘अशुभ हैं ये सब। कम से कम लाल तो महाअशुभ है, जिसके पास आता है, उसके परिवार के एक सदस्य की मृत्यु हो जाती है। जौहरी इस बात को जानता है।’’ उस लड़के की बात सुनकर जौहरी बेतरह घबरा गया।
राजा ने पूछा सच बोलना जौहरी क्या यह सच्ची बात है।’’